मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

गंगा की परछाई में चाँद की अठखेलियाँ...




आज मार्च,२००९ की १० तारीख है.दिन मंगलवार.खाना खाकर अभी- अभी लेटा हूँ.रात्रि के करीब पौने नौ बजे हैं.कमरे में मरघट का सन्नाटा है.फैन अपनी लोकप्रिय आवाज़ की मस्ती में घूम-झूम रहा है.शहर में होली की तैयारी चल रही है और मैं अकेले तन्हां-बोझिल मन से तुम्हारी यादों को टटोल रहा हूँ और उन्हें 'शब्द' दे रहा हूँ,डायरी के पन्नों में... 

तुम सुबह गाँव चली गई.जैसे लग रहा है कि तुम्हारे साथ सब कुछ चला गया,कमरे में सिर्फ तुम्हारी परछाई और यादें सन्नाटे के साथी हैं...

खिड़की के झरोखों से तुम्हारे जाते हुए पग को तब तक देखता रहा,जब तक की वो मेरे नज़रों से ओझल नहीं हो गए.तुम्हारे चलने का अंदाज़ ऐसा था,जैसे कोई तुम्हें धक्का देकर आगे बढ़ा रहा हो,बेमन,बे,अदा,बे रफ़्तार से तुम दायें हाथ में बैग लिए चली जा रही थी,अकेले ! ...सब कुछ लेकर...

तुम्हें गाँव बहुत प्यारा है.तुम अपनी माँ को बहुत प्यार करती हो,पिता को भी ! कोशिश करती हो की तुम्हारे किसी कदम से उन्हें,उनके दिल और सम्मान को,कोई ठेस न लगे...

मुझे मालूम है कि तुम्हारी प्रगति को तुम्हारे परिवार में सिवा माँ-बाप को छोड़कर कोई हजम नहीं करता.तुम्हारे परिवार में सदस्यों के साथ वैचारिक मतभेद हैं.बावजूद इसके तुम उस परिवार में त्यौहार को मनाने  जरुर जाती हो,क्यों इस सवाल का सार्थक और तर्क संगत जवाब भी तुम्हारे पास ही है, और मैं ...?  

जानना चाहोगी आज का दिन कैसे बीता.तुम्हारे जाने के बाद मैं सो गया,दिन भर सोता ही रहा,बीना कुछ खाए-बनाये.जो तुम खिलाये थे,वहीँ  पेट में उर्जा का स्रोत रहा...

करीब पाँच बजे उठा.मंजन किया.स्नान किया.अंगूर खाया,बादाम और काजू भी.इंडिया टुडे पढ़ा.भूख लगी.खाना बनाने चला.गैस पर दाल चढ़ाया,कुछ देर बाद गैस खत्म हो गया.हीटर खोजा.ठीक किया.थोड़ी देर बाद वह भी खराब हो गया.

बाज़ार गया.हीटर का नया एलिमेंट लाया,पन्द्रह सौ वाट का.बहुत देर में सेट हुआ.जैसे ही जला  या.पाँच-पाँच मिनट के अंतराल पर तीन जगह से  एलिमेंट  उड़ गया.अंततः बनाते-बिगाड़ते चावल दाल बनाया और दूध गरम किया.दुकानदार ने बताया था,एक नंबर का है,यह एलिमेंट.ताजुब है                   
एक नंबर का माल,एक घंटा भी नहीं जला-चला.

काफी बनाया चीनी नहीं मिली.या यूँ कहा जाये मैं नहीं खोज सका.जबकि तुम सब कुछ बता कर गए थे.कमरे में मन नहीं लगा रहा था.छत पर गया,फ़िजा में चारो तरफ धुंध था.

उत्तर दिशा की तरफ नज़र घुमाया,शहर की लाइटें टिमटिमा रहीं थीं.इनका प्रतिबिम्ब गंगा की लहरों से अठखेलियाँ कर रही थीं.पूरब की दिशा में मंज़र काफी दिल हिला देने वाला था.गंगा के उस पर दूर...कहीं तीन लाशों के जलने की आकृति दिख रही थी.किसी के लिए होली का जश्न,किसी के लिए तेरह दिन का गम...

पूरब और दक्षिण कोने पर नज़र गयी,राम नगर का किला (पूर्व काशी नरेश),एक दम भक्कसावन दिखा रहा था.कभी इस किले की महफिलें / रातें गुलज़ार हुआ करती थीं,याद कीजिये राजतन्त्र को...!

आसमान में देखा,चाँद बादलों की गोंद में अठखेलियों में मदमस्त था.मेरा चाँद दूर कहीं पूरब और दक्षिण के कोने में किसी गांव के अपने घर में,परिवार में मगन.

आसमान में तारे आज खो गए थे.बहुत नजर दौड़ाने पर दो-चार दिखे.तभी होलिका जलने की आहट,बच्चों के चिल्लाने,चहकने से आयी.आसमान में चारों तरफ होलिका दहन की रौशनी दिख रही थी.एकाएक  आसमान में लालिमा छा गई...

आप सोच रहे होंगे कि पश्चिम की तरफ मेरा ध्यान क्यों नहीं गया,दरअसल उस दिशा में एशिया का सुप्रसिद्ध विश्वविद्यालय का ज्ञान  बलुहट होता प्रतीत हो रहा था और 'मालवीय' जी...छड़ी लिए चले जा रहे थे...!      

छत पर कुछ बालक-बालिकाएं पटाखा लिए चहल कदमी कर रहे थे.वहाँ  की शांति-अशांति में तब्दील होती,इससे पहले मैं कमरे में दाखिल हो गया.कमरे में सन्नाटा था.लेकिन रह-रह कर धड़ाम-धड़ाम की आवाजें आती रहीं.तुम नहीं थी,लेकिन कमरे में तुम्हारी यादें थीं.उसी के सहारे कल्पनाशील बिस्तर के आगोश में...करवटें बदलता रहा,कब नींद आई,पता नहीं...

सुबह आँख खुली.बाहर का मंज़र देखा,चारों तरफ रंग और गुलाल उड़ रहे थे,लोग एक दूसरे के साथ फगुआ खेल रहे थे.और मैं तुम्हारी यादों से...            


मांफ करना तुम्हारी अनुपस्थिति में मैं आज एक 'शब्द' भी नहीं लिख सका.लिखने के लिए दिल,दीमाग और दृष्टिकोण  की जरुरत थी.वह सब तुम्हारे साथ चला गया था या फिर तुम्हारी यादों में खो गया था.मेरे पास थी तो बस शरीर,हाड़-मांस की...
                                          
                                                                            सिर्फ तुम्हारा ! 
                                                                            अब   'ज़ान'... भी जाओ ...!     
                
 अगले भाग की प्रतीक्षा करें !

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

ज्ञान का 'अर्थी' उठाने और 'पिंड दान' करने वाला वर्ग कौन है,मेरे देश की संसद मौन है !


एक वर्ग है जो ज्ञान का उत्पादन कर रहा है
दूसरा वर्ग ज्ञान का प्रचार-प्रसार / बाँट रहा है
एक तीसरा वर्ग है जो ज्ञान का व्यवसाय / व्यापार कर रहा है
एक चौथा वर्ग है जो ज्ञान का 'अर्थी' उठा रहा है
एक पांचवां वर्ग भी है जो ज्ञान का  'पिंड दान' कर रहा है
यह तीसरा,चौथा और पांचवां वर्ग कौन है,मेरे देश की संसद मौन है...     
                                                                                                --रमेश यादव 

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

पूंजीवाद की विद्या हो या साम्यवाद की...


विद्या : आयात का साधन हो या निर्यात की मजबूरी !

विद्या !  तुम्हारे कितने रूप हैं ?
कोई तुम्हें अर्जित करता है,कोई वर्जित रहता है

कोई तिकड़म और जालसाजी से सब कुछ पा लेता हैकोई तुम्हें पाने के लिए दिन-रात रगड़-घिस करता है 

कोई लूटता और भ्रमित करता हैकोई अपराधी को झूठे तर्क से बचाता है और लोगों के नज़रों में होनहार बन जाता है      

कोई तुम्हारी आड़ में अपनो को उपकृत करता है,कोई उपकृत होता है  कोई धड़ाम- धड़ाम करता है,कोई भड़ाम- भड़ाम

यहाँ भी तुम्हारी ही बलिहारी की जय-जय कार होती है
 तुम कितने रूपों /स्वरूपों में मौजूद हो !


तुम क्या हो...?
किसी के लिए जीवन/जीविका की साधन हो
किसी के लिए दुरुपयोग का माध्यम हो

कुछ के लिए बौधिक प्रदर्शन का प्रतीक हो
कुछ के लिए अछूत हो

कुछ के पहुँच से बाहर हो
किसी के लिए चालाकी,लालच,चालबाजी,शातीरपन,तिकड़म,षड्यंत्र,इस दिशा में जितने 'शब्द' बनते हैं,उनके लिए सहायक हो

एक वे हैं जो तुम्हारे सहारे सही वक्त पर सही काम करते हैं
वे ही अक्सर संकट में क्यों रहते हैं ?
विद्या !

तुम बहुतों के लिए 'शिक्षा' हो
अधिकांश के लिए 'राजनीति' हो

किसी के लिए व्यापार हो
किसी के लिए व्यवसाय 

एक तुम्हारा 'आयात' करता है
दूसरा निर्यात 

सवाल उठता है
तुम्हारा असली रूप क्या हैं  

तुम आयात का साधन या निर्यात की मजबूरी
एक के लिए सहायक हो 
दूसरे के लिए असहाय 

कुछ के लिए 'धड्पकड़' हो
कुछ के लिए आपराधिक मानसिकता गढ़ती हो 

एक तुम्हारे बदौलत जग जीतता है
एक तुम्हारे सहारे जग/देश को बेचता है

तुम्हारा 'लाइसेंस' जिसके पास हो वह क्या नहीं करता है ?
एक तुम्हारे सहारे मारता है

एक तुम्हारे सहारे मरता है
एक तुम्हारे सहारे ही उसे बचाता है

तुम किसी के लिए बोध हो 
किसी के लिए अबोध 

वास्तव में !
तुम कितना कन्फ्यूजनात्मक हो

किसी के लिए धन उगाही का साधन हो
किसी के लिए 'धनदान' 

तुम्हारे ज्ञान का जवाब नहीं !
कोई लायक है
कोई नालायक है

तुम्हारा योगदान क्या है ?
एक शोधार्थी है
एक लूतार्थी है
तुम इन सब में कैसे संतुलन बनाती हो

विद्या !
तुम कितनी निराली हो
किसी के लिए धूप हो

किसी के लिए छाँव
किसी के लिए सुख हो
किसी के लिए दुःख 

तुम हकीकत में क्या हो ?
तुम्हारा कौन सा सच्चा चेहरा है ?

तुम्हारे रूप का रह्श्य कितना गहरा है
जो तुम दिखती हो या जो तुम छपती हो

छलियों के लिए तुम छलिया हो ?
तुम्हारे दर पर सब जाते हैं

तुम किसका साथ निभाती हो
अमीर या गरीब का

ऐसा क्यों प्रतीत होता है कि तुम 'न्यायविद' नही हो
तुम्हारे खिलाफ इल्जाम सही है ?

अगर तुम सबके लिए समान हो 
अलग-अलग रूप में क्यों दिखती हो

तुम किस कोटि की विद्या हो ?
किसी के लिए 'डिस्टेंस' हो

किसी के लिए फेस-टू-फेस
किसके प्रति जबाबदेह हो
दूर या नजदीक के लिए

विद्या !
एक के लिए तुम बाज़ार गढ़ती हो 
दूसरे के बनती हो

एक के लिए 'ग्लोबल' हो
दूसरे के लिए लोकल हो
तीसरे के लिए 'वोकल' हो 

 विद्या !
तुम 'दान' की हो या 'खान-दान' की 
तुम स्वार्थ की विद्या हो या निःस्वार्थ की 

तुम एक के लिए भ्रम फ़ैलाने का जरिया हो
दूसरे के लिए ज्ञान के प्रकाश का श्रोत 

एक के लिए भौकाल हो
दूसरे के लिए कंकाल हो
किसी के लिए निराकार हो
  
एक के लिए खिचड़ी हो
दूसरे के लिए खीर

एक के लिए रोजगार हो
दूसरे के लिए बेरोजगार

एक के लिए धांधली हो
दूसरे के लिए 'धर्मसंकट'

एक के लिए 'धनसंकट' हो
दूसरे के लिए 'अल्पसंकट'

एक के लिए गुणवत्ता हो
दूसरे के लिए गुणवत्ताहीन

एक के लिए हिमालय हो
दूसरे के लिए खाई हो...

एक के लिए सागर हो 
दूसरे के लिए ताल-पोखर 

एक के लिए वक्ता हो
दूसरे के लिए श्रोता 

तुम साधना की या कब्जा की विद्या हो 
तुम किसी को उठाती हो
किसी को गिराती हो

किसी को सहलाती हो 
किसी को फुफकारती हो 

किसी को तृप्त करती हो
किसी को उपकृत 

किसी को स्वीकृत करती हो
किसी को अस्वीकृत 

नोट की विद्या हो या श्रोत की 
खरीद दारी की या फौजदारी की 

युद्ध की विद्या हो या शान्ति की 

दुर्भावना की विद्या हो या सद्भावना की
कूटनीति की विद्या हो या रणनीति की 

नीति की विद्या हो या अनीति की 
तुम पूंजीवादी या साम्यवादी हो

विद्या !
तुम्हें गदहिया गोल से पीएच.डी तक बहुत जानने-समझने की कोशिश किये,लेकिन अंततः नाकाम ही रहे.
अब तो बतादो 
क्या हो ? 
अचरज या रहस्य .......  
..........................................................रमेश यादव 

रविवार, 4 दिसंबर 2011

"नाऊ,धोबी-दरजी,ये तीनों अलगरजी"



"नाऊ,धोबी-दरजी,ये तीनों अलगरजी" 

१. दरजी !
बचपन में जब कभी बुजुर्गों के मुख से ये उक्ति सुनता था तो इसका अर्थ बहुत स्पष्ट समझ में नहीं आता था.जैस-जैसे बढ़ता गया,इसे सही अर्थों में समझता गया.

करीब 6 -7 साल की उम्र रही होगी.होली का त्यौहार था.तब इस त्यौहार को हम बच्चों के लिए  नए कपडे सिलवाया जाता था.गाँव से कुछ दूर एक पीढ़ी गत रिश्ते के दरजी के पास हम लोगों का कपड़ा सिलने के लिए दिया जाना था.नाप देने के लिए सशरीर जाना पड़ा.

दादा ने पूछ कब मिलेगा,बोला आज से पांचवे दिन.जिस दिन दादा कपड़ा लेने जा रहे थे.उत्साह में हम लोगों ने भी जाने की जिद की.दादा मान गए.हम लोग खेलते-कूदते पहुंचे.

दरजी के यहाँ होली के 'त्यौहार' पर कपड़ा देने-लेने वालों की भीड़ जमा थी.दादा को देखते ही दरजी बोला सरदार जी ! अभी तैयार नहीं है,कल भेजवा दूंगा.आने की जरुरत नहीं है....

इतना सुनना था कि 'दादा' गरम हो गए..... 

खास: 
कपडे हम लोग पहनते थे,सिलाई का नमूना बड़े बुजूर्ग पसंद/तय करते थे.उन लोगों का पसंद, हम लोगों के पसंद पर भारी पड़ जाता था.बचपन भी बुजूर्गों की मर्जी और पसंद के हवाले था.  

२. नाई !

खैर,हमलोग,मसलम, हम और हमसे ६ माह छोटा,मेरे चाचा.दादा बोले चलो तुम दोनों का बाल कटवाते चलते हैं.

जब हम लोग पीढ़ी गत नाई के पास गए,देखा कि उसके यहाँ भी लोग अपने बारी का इंतजार में बैठे हैं.हम लोगों को देखते ही दादा से बोला सरदार जी !

आप घर जाइये,कल सुबह हम 'पाही'  पर ही आ जायेंगें.दादा बोले जरुर आ जाना,होली आ रहा है,उसने बोला,जी ! आज शाम को छुरा पर 'धार' दिलवाने जाना है,कल जरुर से आऊंगा. 

तीन दिन तक उसका कल नहीं आया....
 
३. धोबी !

हम लोग पाही के नजदीक पहुंचे ही थे कि गाँव से आते हुए धोबी को दादा ने देख लिया.दादा कुछ मामलों में हमेशा चौकन्ना रहते थे.धोबी के मामले में भी.बोले क्या मंगरू कपड़ा लाये,बोला ! सरदार जी,सोमवार से लगातार मौसम ख़राब हैं.

कपड़ा तो धो दिया हूँ,लेकिन सुखा नहीं है.दादा बोले लेकिन तुम तो शनिवार को ही पहुँचाने का वादा किये थे.

बोला वो क्या था कि घर पर मेहमान आ गये थे,इसलिए धोने के लिए मौका ही नहीं निकल सका.

अब आप लोग समझ ही गए होंगे कि उक्त तीनों घटनाक्रम के बाद 'दादा' के दिमागी पारा का ग्राफ क्या रहा होगा...? 

दादा फटकारते हुए.पाही पर चल दिए.पाही पर एक दो मेहमान आये हुए थे,बाकि सब चाचा महफ़िल जमाये हुए थे.

दादा से लोगों ने पूछा क्या हुआ 'बाऊजी' कपड़ा नहीं मिला...इसी बीच मुझसे छोटे चाचा ने दादा को चिढ़ाने के लिए बोल दिया,फालतू का घूमा रहे हैं,सुबह से एक काम नहीं हुआ.

दादा भड़क गए,बोले सा..... 

"नाऊ,धोबी-दरजी,ये तीनों अलगरजी" 

दादा अब दुनिया में नहीं रहे.

आज 

आज तीस साल बाद उनकी कही यह बात याद आ गयी.शाम को धोबी को अल्टर के लिए पैंट दिया था.बोला एक घंटे में आइये,मिल जायेगा.जब मैं गया तो बोला अभी तैयार नहीं है,कल ले लीजियेगा....



नोट. 
इस पोस्ट को जाति गत निगाह से नहीं,पेशे गत नज़र से देखें और पढ़ें...   

बुधवार, 23 नवंबर 2011

छ-छ पैसा,चल कलकत्ता


मित्रों ! 
कल हमने 'बुद्धू' की डायरी प्रस्तुत करने की सूचना दी थी,लेकिन अब 'बुद्धू' की जगह 'पढ़े-लिखे अजनबी' के नाम से प्रस्तुत कर रहा हूँ.यह सुझाव 'बुद्धू' का है.
 (भाग एक) 
लड़कियाँ उन्हें 'पढ़े-लिखे पगलेठ' कहती थीं,लेकिन 'बुद्धू' अपने को 'पढ़े-लिखे अजनबी' समझते थे.  
किसी की यह पंक्तियाँ उधार लेकर 'बुद्धू' अपने जीवन दर्शन को इस तरह गुनगुनाया करते थे-
बदला न अपने आप को जो थे वही रहे
मिलते रहे सभी से मगर 'अज़नबी' रहे   
अपने तरह अर्से से किसी की तलाश है 
हम जिसके भी करीब रहे,दूर ही रहे.  

'पढ़े-लिखे अजनबी' का 'नंगा युग'
मेरा जन्म १९७० के दशक के प्रारंभ के चौथे वर्ष के किसी महीने में हुआ था.इसके साल,समय और तारीख का लिखित और अधिकारिक प्रमाण मेरे पास नहीं है.उस समय के स्कूलों में लोग अनुमान के सहारे दाखिला कराते थे.मेरा भी इसी पद्धति से हुआ था.मेरे पैदाइश के कुछ साल बाद मेरी माँ,नानी गाँव आ गयीं.मेरा 'नंगायुग' यहीं बीता.यह गाँव एक औद्योगिक इलाके से सटा हुआ था.इन दोनों के बीच में एक रेलवे लाइन थी,जो दोनों को चीरते हुए दिल्ली निकल जाती.लेकिन यहाँ के लोग कभी दिल्ली नहीं जाते.सिर्फ दिल्ली और कलकत्ते की तरफ ट्रेनों को आते-जाते देखते और एक दिन सवार होने के लिए सपने बुनते.ट्रेनें आखों से ओझल हो जातीं,ख्वाब लोगों के दिलों में सिमट जाते.खेतों में काम करने वाले लोग,खासकर महिलाएं ट्रेनों को आते-जाते देखतीं.ट्रेनों के गुजरते समय खेत मालिक इन महिलाओं पर खास ध्यान रखता.      
गाँव में सभी जातियों का मिश्रण था,लेकिन दबदबा बनिया वर्ग का था.गाँव के सम्पूर्ण भू-भाग के ७५ फीसदी हिस्से पर इनका ही कब्ज़ा था.बाकी जातियों के अधिकतर लोग,इनके यहाँ मजदूरी करके जीवनयापन करते थे.गाँव में बनियों ने 'आम' और 'नीबू' के कई बागीचे लगा रखे थे.क्या मजाल की गाँव के बच्चे आम के पेंड़ पर एक ढेला चला दें.यदि किसी को ढेला चलाते हुए बगीचा मालिक देख लेता तो उसके घर तक दौड़ाता.बगीचा से हमारा घर नजदीक था.हम बच्चे इसका फायदा उठाते.बगीचा मालिक दूर कहीं से चिल्लाता.हम सब भागकर किसी के घर में छूप जाते.मोहल्ले में आकर वह दहाड़ता.लोगों से शिकायत करता.किसी दिन पहचान लेता तो घर तक पहुँच जाता.माँ से बोलता 'मंजरी' अपने बेटे को समझाओ.मोहल्ले के बदमाश लड़कों के साथ घूमता है.माँ बोलतीं.आने दीजिये,आज उसको बताउंगी.घर पहुँचने पर डाट सुननी पड़ती.ननिहाल होने का मुझे भरपूर फायदा मिलता.क्योंकि मेरी नानी मेरे लिए 'कोतवाल' सरीखा थी. 
लोग बहुत प्यार करते.लेकिन मेरी बदमाशियों को 'माँ' तक जरुर पहुँचाते.गाँव के सर्वाधिक भू-भाग पर बनियों का ही कब्ज़ा था.सर्वाधिक संसाधन उनके पास थे.सिंचाई के साधन तो थे,लेकिन जमीन ऊसर हुआ करती थी.जो पानी खेतों में इकठ्ठा होता उसका रंग मटमैला होता.जाड़े और गर्मियों में बहुत सारे लोग अपने खेतों से 'रेह' उठाने के लिए धोबियों को देते,बदले में उनसे पर लादी (बोरी) पैसे लेते.नाना के पास जो जमीन थी,उनमें से एक बीघे में 'रेह' होता था.हम लोग धोबियों को देखते ही उन्हें पकड़ लेते.खेत पर ले जाते.धोबी खेतों से 'रेह' निकालते हम लोग 'गदहों' को दौड़ते,उनसे खेलते.धोबियों के मना करने का हम पर कोई असर न होता.जो पैसा मिलता,उससे हमलोग लमचुस खरीदकर खाते,अब इसे बाज़ार में 'लाली पॉप'  के नाम से जाना जाता है.
हमारी एक दोस्त थी,सरिता.हम दोनों पूरे दिन और देर रात तक एक साथ होते.हमारे बचपन की धमाचौकड़ी एक साथ होती.हम अपनी गाय,उसकी भैंसों के साथ चराते.गाँव के पश्चिम दिशा में रेलवे लाइन थी.उसी से लगे उसके खेत थे,हम अक्सर उधर ही पशुओं को ले जाते.उसका बड़ा कारण था.रेलवे लाइन के दोनों किनारे खूब हरी-भरी घास होती.पशुयें घास चरने में मस्त और हम सब खेलने में मशगूल.खेल भी गुड्डे-गुड़ियों का.अक्सर हमारे और सरिता के बीच पहले गुड्डे-गुड़ियों की 'शादी' और फिर उनके 'सुहाग रात' को लेकर लड़ाई होती.हम लोग घंटों एक दूसरे से बात नहीं करते.फिर वहीँ ढर्रा चल पड़ता.
जब भी कोई पैसेंजर ट्रेन गुजरती हम लोग देर तक उसे देखते रहते.इस रास्ते से गुजरने वाली ट्रेनों को हमलोग अलग-अलग नामों से पुकारते.मसलन               
'बारह बजहिया','चारबजहिया'. इसका तालुकात १२ बजे और चार बजे से था यानि समय से.इनकी पहचान ट्रेनों के रंग से होती.जिस दिन ट्रेन देर से आती लोग इसका अनुमान लगा लेते.यह ज्ञान हम लोग गाँव के लोगों से ग्रहण किये थे.जो ट्रेनों का बिना नाम पढ़े रंग और समय के आधार पर उनका नामकरण कर देते.जाहिर है ये लोग अपने पूर्वजों से यह विरासत में पाए रहे होंगे.अब सोचता हूँ.रेलवे इस गवईं नामकरण पर कोई शोध नहीं किया होगा.यह ट्रेनें कलकत्ते से आतीं और दिल्ली की तरफ कूच कर जातीं.ट्रेनों के चलने से जो आवाज़ होती,उसे हम लोग दोहराते 'छ-छ पैसा,चल कलकत्ता'- 'छ-छ पैसा,चल कलकत्ता'.नादानी का नमूना देखिये.हम लोग चलती ट्रेनों पर गिट्टी मारते.कभी-कभी उल्टी दिशा में जाते हुए.कभी-कभी अपनी तरफ आते हुए.एक बार इसी शरारत का परिणाम भुगतना पड़ा.सरिता ने अपनी तरफ आती हुयी ट्रेन पर गिट्टी मारी,गिट्टी उसके सिर पर आ लगी.उसी दिन से गिट्टी फेंकना बंद हो गया.यहीं बात जब लोग समझाते तो हम लोग नहीं मानते.चोरी.चोरी फेंकते.                 

शब्दार्थ: 
१.'रेह' :  जो जमीने ऊसर थीं,उसके ऊपर एक सफ़ेद रंग की परत जमती,जिसे गाँव के लोग 'रेह' कहते.वे लोग,इसे धोबियों को देते.धोबी 'रेह' को गदहों पर लाद कर नजदीक के शहर ले जाते.इससे कपड़े धोते.हम लोग भी इसका इस्तेमाल करते.कपड़ा चमक जाता.लेकिन उसकी उम्र कम हो जाती.यह १९७० के दशक का उतरार्द्ध था.       
   
जारी ...

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

'बुद्धू' की डायरी का इंतजार...!



आज यानी २१ नवम्बर,२०११ से आप सब के समक्ष
'बुद्धू' की डायरी नाम से एक सीरिज प्रस्तुत करने जा रहा हूँ.
प्रस्तुत डायरी में 'दिन-तारीख और घटनाएँ सिलसिलेवार नहीं दिखेंगी/मिलेंगी.
क्योंकि 'बुद्धू' जी ने इतनी डायरियां लिखी हैं,जिसका एक जगह संग्रह नहीं है.
जैसे-जैसे 'बुद्धू' की डायरी के अंश मिलते जायेगें,वैसे-वैसे उनके जीवन का सच उजागर होता जायेगा.
अब आप सब यह जानना चाहेंगे कि 'बुद्धू' नाम का जीव है क्या ?
तो सुनिए... !
इसके पीछे का इतिहास यह है कि 'बुद्धू' जिस लड़की से मिलता-जुलता,मेल-मिलाप रखता-बढ़ाता,उसकी आँखें-चहरे की भाषा,देह/शरीर का मनोविज्ञान और परिभाषा नहीं समझ पाता,जिसकी वजह से लड़कियाँ उसे 'पढ़े-लिखे बुद्धू' कहकर चिढाती,अक्सर उसकी ज़िन्दगी से दूर चली जातीं थीं.        
'बुद्धू' को इस बात का अहसास बहुत... बाद में होता,तब तक उसकी पूरी दुनिया ही बदल चुकी होती.
इस प्रस्तुति में छंद,भाषा,शिल्प,गठन,प्रवाह और व्याकरण पर ध्यान न दें,सिर्फ और सिर्फ भावरस का रस्सास्वादन करें.
मज़ा आने पर आलोचना आमंत्रित है...        

रविवार, 18 सितंबर 2011

'विज्ञापन' दो,हम आपके पक्ष में 'भोकेंगे'... !


  
कल तक 'अन्ना-अन्ना' चिल्लाने वाला मीडिया.आजकल 'मोदी-मोदी'  चिल्ला रहा है.
तीन दिन के 'उपवास' को "मोदी का नया अवतार" के बतौर प्रसारित-प्रचारित कर रहा है.
उपवास के पूर्व 'माँ' का आशीर्वाद और 'माँ' की तरफ से 'रामचरित मानस' भेंट की तस्वीर को मीडिया ने प्रमुखता से प्रसारित-प्रचारित किया है.
किसी मीडिया ने यह समीक्षा नहीं की कि क्या 'रामचरित मानस' पढ़ने या भेंट करने से 'मोदी' के ऊपर लगे गुजरात देंगे का 'दाग' धुल जायेंगे. 
मोदी को 'उपवास' करने के लिए एक मात्र जगह विश्वविद्यालय ही मिला था.क्या विश्वविद्यालयों को अब राजनैतिक अखाड़े के तौर पर इस्तेमाल किया जायेगा.(कब नहीं किया जाता था)     
विश्वविद्यालयों की अपनी कोई छवि होगी की नहीं.इसकी बची हुई स्वतंत्रतता,निष्पक्षता और निरपेक्षता बरक़रार रहेगी या नहीं(?).
मीडिया जिस तरह से 'मोदी' के 'उपवास' को दिखा रहा है.उसमें एक बात सर्वाधिक खतरनाक यह है की अगले पार्लियामेंट के चुनाव में भारतीय जनता को 'मोदी' और 'राहुल' में से किसी एक को प्रधानमंत्री के तौर पर चुनाव करना है.यानि इन दोनों के आलावा तीसरा कोई विकल्प नहीं है.मतलब जनता  विकल्पहीनता की शिकार है.लोग मीडिया की राय मान लें.मीडिया इसके लिए जनमत तैयार करना शुरू कर दिया है.
सोचता हूँ.जिस व्यक्ति ने मीडिया को "वाच डॉग" (अभी नाम याद नहीं आ रहा है) का नाम दिया होगा.वह कितना दूरदर्शी रहा होगा.परंपरागत सोच है मालिक जब कुत्ते को चारा देता है तो बदले में उससे 'वफ़ादारी' और 'बेहतर' रखवाली की उम्मीद करता है.आज बात मौजूदा मीडिया के चरित्र को लेकर कहा जा सकता है.'विज्ञापन' दीजिये.मीडिया आप के पक्ष में भोंकने के लिए तैयार बैठा है.'मोदी' भी 'विज्ञापन' जारी किये हैं,'फुल पेज' का.जाहिर है फ़र्ज़ निभाना तो पड़ेगा."वाच डॉग" जो ठहरे.यह पूंजीवाद का असली स्वाभाव है.पूंजी बटोरने के लिए और गुजरात में व्यावसायिक लाभ-मुनाफा कमाने के लिए पूंजीपति किसी भी हद तक जाकर समझौता कर सकते हैं.यह 'दर्पण' की तरह साफ है.    
यदि मीडिया इसी तरह से 'कवर' करता रहा तो 'अनशन','उपवास' और गाँधी के अन्य राजनैतिक प्रयोगों को राजनैतिक पार्टियों को इसे 'ढोंग','पाखंड' और 'कर्मकांड' में तब्दील करते देर नहीं लगेगा.इसकी शुरुआत हो चुकी है.
कार बनाने वाली देश की अग्रणी कंपनी मारुती सुजूकी के मानेसर प्लांट के श्रमिक गत २० दिनों से धरने पर बैठे हैं.वे ६२ श्रमिक साथियों को काम पर वापस लेने की मांग पर अड़े हैं.इसे किसी टीवी मीडिया ने खबर बनाने की जहमत नहीं उठाई.